◆ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं पाथेय कण पत्रिका के संरक्षक माणकचंद जी ‘भाईजी’ के निधन के बाद पाली के सोमनाथ मंदिर मार्ग स्थित संघ कार्यालय परिसर में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ। बड़ी संख्या में स्वयंसेवक, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रबुद्ध नागरिकों ने उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। आइये, जानते हैं विस्तार से खबर।
◆ जिला संघचालक नेमीचंद अखावत ने बताया कि सभा में वक्ताओं ने ‘भाईजी’ के जीवन, कार्य और आदर्शों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने प्रचारक जीवन की कठिन साधना करते हुए संगठनात्मक, बौद्धिक और वैचारिक क्षेत्रों में अनुकरणीय योगदान दिया तथा अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा को समर्पित किया।
संघ के पूर्व प्रचारक विजय कृष्ण नाहर ने बताया कि ‘भाईजी’ की स्मरण शक्ति अद्वितीय थी, वे रामचरितमानस की चौपाइयों के साथ 500-600 स्वयंसेवकों के नाम तक तुरंत याद कर लेते थे। पाथेय कण की जिम्मेदारी मिलने के बाद 90 प्रतिशत विकास माणकचंद जी के प्रयासों का परिणाम था। उनका काम के प्रति समर्पण, मधुर स्वभाव और कर्मठता हर कार्यकर्ता के लिए आदर्श रही।
गौतम चंद यति ने कहा कि माणक जी का स्वभाव अत्यंत आत्मीय और स्नेहिल था। वे बाहर से आए कार्यकर्ताओं को भी वही अपनापन देते थे जो अपने नजदीकी सहयोगियों को मिलता था। जीवन भर उन्होंने पाथेय कण के लिए अर्थव्यवस्था सुनिश्चित की, लेकिन निजी इच्छाओं से दूर रहे।
प्रवीण कुमार त्रिवेदी ने बताया कि ‘भाईजी’ की सहजता और आत्मीयता उन्हें सबका प्रिय बनाती थी। वे स्वयंसेवकों के परिवारों से वर्षों बाद भी नाम याद रखते और घर में रसोई से जो भी बनता, बिना संकोच के खा लेते थे।
◆ उल्लेखनीय है कि माणकचंद जी ‘भाईजी’ का निधन 30 जुलाई को जयपुर के एसएमएस अस्पताल में 83 वर्ष की आयु में हुआ। वे पिछले एक माह से किडनी रोग से पीड़ित थे। उनका जन्म 2 नवम्बर 1942 को नागौर जिले के कसारी-बड़ा गांव में हुआ था। वर्ष 1966 में वे पूर्णकालिक प्रचारक बने और लगभग छह दशकों तक राजस्थान सहित अनेक प्रांतों में संघ के प्रचार और विस्तार हेतु कार्यरत रहे।
◆ KNTV के लिये पाली से महेन्द्र लखावत की खास रिपोर्ट








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